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Tuesday, 24 December 2013

चाय की चुस्की

                        

अभी कुछ दिन पहले ऑफीस से तीन दिनों की छुट्टी ले कर घर पे आराम कर रहा था.... इसी दौरान कॉलेज के कुछ दोस्तों से मिलने का प्लान बनाया.... लगभग दो साल बाद हमलोग मिलने वाले थे..... मिलने की जगह तय हुई हमारे कॉलेज से कुछ कदमों की दूरी पर थी एक चाय की दुकान..... जहां कॉलेज के समय हम लोगों का हमेशा जमावड़ा लगा करता था..... और ना जाने कई घटों तक वहां बैठ कर चाय के चुस्की के साथ गप्पे मारते रहते..... यही अपने फुर्सत के लम्हें को एक प्याली चाय की चुस्कियों में बिताने आते.... दो साल बाद जब एक बार फिर मिलने का मौका मिला तो सबने एक ही जगह चुना वही चाय की दुकान..... जी हां चाय की दुकान आप सब शायद हैरान हो कि इस मैकडोनाल्ड और पिज्जा हट की चकाचौंध भरी दुनिया में मिलने की जगह चुना भी तो चाय की दुकान ही तो भैया आपको बता दे कि चाय की दुकान का मजा भी एक अजीब मजा है..... हम कॉलेज लाइफ से लेकर ऑफीस लाइफ तक जहां भी जाते है..... एक ना एक चाय की दुकान ढूंढ़ ही लेते है..... और यही हम अपने फुर्सत के लम्हें को बिताने आते हैं.... और यही फुर्सत के बिताए हुए लम्हों को हम याद रखते हैं..... आपने भी तो कभी ना कभी अपने दोस्तों या सहकर्मियों के साथ दूर छिपे किसी कोने में चाय की दुकान पर एक प्याली चाय पी ही होगी..... है ना मजेदार, यहां आपको सर या मैडम कहते लड़का या लड़की नहीं दिखेंगी..... और ना ही आपको खाने के लिए लंबा सा किताबीनुमा मेनू थमाया जाएगा.... हम सभी दोस्त इस याद को ताजा करने के लिए वहां पहुंचे..... वहां पहुंच कर देखा, वहां का नजारा ही बदल चुका था..... नहीं बदली तो वो चाय की दुकान..... हां, लेकिन उस चाय की दुकान में भी कुछ चीजें समय के साथ बदल गई थी.... उस दुकान में अब पहले से ज्यादा सामान मिलने लगा था.... वहां अब एक बुढ़े अंकल की जगह एक नौजवान था.... मैंने पूछा, यहां जो अंकल बैढ़ते थे वो कहा गए.... उसने कहा कि उनके गुजरे तो एक साल हो गए..... यह सुनकर हम लोगों को बहुत दु:ख हुआ..... हम लोगों का उनसे कोई रिश्ता तो नहीं था और ना ही हम उनके नाम जानते थे.... लेकिन उनसे एक प्याली चाय का रिश्ता था.... और हम लोग उन्हें चाय वाले अंकल के नाम से जानते थे.... ना सिर्फ उस अंकल बल्कि यहां आने वाले सभी लोगों के बीच एक अनुठा रिश्ता बन गया था.... यहां हम एक दूसरे को नाम से नहीं, उनकी मौजूदगी से जानते थे..... यहां किसी को शायरी वाले भैया, किसी को पल्सर वाले भैया, किसी को सलमान खान तो किसी को अमिताभ बच्चन के नाम से जाना जाता था..... कोई यहां आर्थिक मंदी का रोना रोता तो कोई बेरोजगारी का..... कोई यहां विराट और धोनी को क्रिकेट का गुर सिखाता..... तो कोई राजनेता को राजनीतिक गुर..... ऐसा लगता मानो तमाम आर्थशात्री, वैज्ञानीक, क्रिकेटर, एक्टर, राजनेता यही से पनपेंगे..... और कांग्रेस बीजेपी को चुनावी रणनीति यही से बनवानी चाहिए..... जब हम लोग यहां मिले तो इन्ही सब यादों को ताजा कर रहे थे..... यकीन मानीए ये किसी पांच सितारा होटल से कम मजेदार नहीं था।