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Saturday, 23 May 2015

केजरी और एलजी के बीच 'जंग'

कहते है राजनीति में सबकुछ माफ़ होता है, क्योंकि यहाँ कुछ नहीं साफ होता है.... इसका मतलब ये नहीं कि साफ-सुथरी राजनीति नहीं हो सकती, साफ-सुथरी राजनीति लोग होने नहीं देते हैं.... दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से जो कुछ चल रहा है.... उसमें मुझे लगता था कि गलती केजरीवाल जी की है..... मुझे लगता था कि उनमें अब भी बचपना हैं, वो स्कूल जाते उन बच्चों के तरह हैं जो बात-बात पर लड़ने लगते हैं..... लेकिन काफी अध्यन करने के बाद पता चला कि ताली एक हाथ से नहीं बजती..... दरअसल, केंद्र हमेशा से ही दिल्ली पर अपना नियंत्रण लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिए सुनिश्चित करता रहा है, दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र को लेकर खींचतान की नौबत तभी आई जब केंद्र और दिल्ली में अलग-अलग पार्टी की सरकारें रहीं..... लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार इस व्यवस्था को जिस हद तक खींच रही है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि यह ज्यादा दिन चलने वाली है..... एलजी को समझना चाहिए कि उन्हें अधिकार इसलिए नहीं मिले हैं कि वे एक निर्वाचित राज्य सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराते रहें..... उन्हें यह जिम्मेदारी इसलिए मिली है, ताकि कुछ असाधारण स्थितियों में ठीक एक अभिभावक की तरह वे जनता के हितों की रक्षा कर सकें.... केंद्र की बीजेपी सरकार अगर ऐसा सोचती है कि यह सब करके वह अरविंद केजरीवाल की ढिबरी टाइट कर देगी तो यह उसकी सबसे बड़ी गलती है..... इस मुद्दे पर मेरे मन में एक सवाल है जिसका जवाब मैं आप सबसे जानना चाहता हूँ..... सवाल यह है कि क्या अपने अफसरों की नियुक्तियों में एक निर्वाचित सरकार के हाथ बंधे होने चाहिए? अगर एक चुनी हुई सरकार अपने अधिकारियों की नियुक्ति, तैनाती और तबादले संबंधी फैसले नहीं कर सकती, तो उसकी प्रशासनिक जवाबदेही कैसे तय की जा सकती है?




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