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Saturday, 4 July 2015

वेतन के साथ जवाबदेही भी बढ़ाएं सांसद !

जैसे-जैसे देश में सांसदों के संसदीय बर्ताव और काम करने के तौर-तरीकों में गिरावट आ रही है, वैसे-वैसे सुविधाओं की उनकी मांगें बढ़ती जा रही हैं.... बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली संसद की संयुक्त समिति ने कहा है कि सांसदों के वेतन को दोगुना कर दिया जाए.... बात यहीं तक सीमित नहीं है.... सांसदों का दैनिक भत्ता 2000 रुपए से अधिक करने और पूर्व सांसदों का पेंशन भी 75 फीसदी बढ़ाने का प्रस्ताव है.... वर्तमान में सांसदों को मासिक वेतन 50,000 रुपये मिलता है.... अपने क्षेत्र में काम कराने के लिए प्रत्येक सांसद 45,000 रुपए का भत्ता हर महीने पाने का हकदार है... ऑफिस के खर्च के लिए भी हर महीने इतनी ही रकम मिलती है.... कपड़े और परदे धुलवाने के लिए हर तीसरे महीने 50,000 रुपए मिलते हैं.... और सड़क मार्ग का इस्तेमाल करने वाले सांसदों को 16 रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से यात्रा भत्ता मिलता है.... इसके अलावा भी और कई सुविधाएं इन्हें मिलती हैं.... लेकिन यह सब इन्हें कम लगता है.... संसद भवन की कैंटीन का रेट तो गजब ही है... यहां 20 रुपये में मटन करी और 4 रुपये प्लेट चावल.... दो रुपये में पूड़ी-सब्ज़ी खा सकते हैं.... यानि अंत्योदय योजना अगर कहीं ठीक चल रही है, तो वो संसद भवन की कैंटीन ही है.... लेकिन इतना सब मिलने के बाद भी इन्हें लगता है कि इन्हें मिलने वाली सुविधाएं कम हैं.... वहीं दूसरी तरफ हमारे देश की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिक पंद्रह जून से जंतर मंतर पर वेतन और पेंशन के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं.... जिनका सुध लेने वाला कोई नहीं है.... लेकिन जनता के ये नुमाईदें कितनी आसानी से अपनी सुख-सुविधा और सैलरी बढ़ाने का प्रस्ताव भेज देते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठता लाजमी है कि सांसदों के वेतन तय करने का अधिकार सांसदों को ही क्यों हो? क्यों ना लोकतांत्रिक व्यवस्था के सिद्धांत के मुताबिक इस तरह के फैसलों में कुछ निष्पक्ष और जानकार लोगों की भागीदारी होनी चाहिए.... किसी को भी जब अपनी तनख्वाह खुद तय करने का अधिकार नहीं है, तो सांसदों को क्यों हो? क्यों ना ऐसी समिति में सांसदों के अलावा प्रतिष्ठित न्यायविदों, कार्यपालिका के सेवानिवृत्त अधिकारियों और नागरिकों को भी जगह दी जाए? इससे यह पूरा कामकाज पारदर्शी हो जाएगा और यह भी आरोप नहीं लगेगा कि सांसद खुद ही अपने पैसे बढ़वा लेते हैं.... दूसरा सवाल यह भी है कि सांसदों को संसद सत्र के दौरान जो भत्ता मिलता है, वह भी तभी जायज माना जा सकता है, जब सांसद संसदीय काम को गंभीरता से लें और संसद में बहस व चर्चा करें... सबने देखा है कि संसद के कई सत्रों में पूरे-पूरे सत्र में कोई कामकाज नहीं होता, सिर्फ हंगामा होता है... लोकसभा सचिवालय के दस्तावेजों में इस बात का पूरा ब्योरा है कि सांसदों में से कितने कभी-कभार कोई सवाल पूछा या कौन से सांसद सिर्फ हाजिरी भरने और भत्तों की सुविधा का लाभ उठाने आए? यह ब्योरा भी कई बार सामने आ चुका है कि संसद की कितनी बैठकों में कितने घंटे सार्थक काम हुआ और कितना समय व्यर्थ के हंगामे और कार्य स्थगन की भेंट चढ़ गया... लगभग हर सत्र की यह परंपरा रही कि काम कम और हंगामा ज्यादा.... यह हालत तब है, जब सांसदों के वेतन और सुविधाओं में कई गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है.... हालांकि महंगाई और बदलते जीवन स्तर को देखते हुए यह बढ़ोत्तरी जायज भी है..... लेकिन सांसद अपना वेतन के साथ-साथ जवाबदेही भी बढ़ाएं, तब शायद इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं होगी... अगर अपने आम वोटरों की जिंदगी पर, उनके जीवन की तकलीफों-चुनौतियों पर नजर डालने का वक्त इन्हें मिले तो शायद इनकी भी प्राथमिकता कुछ बदले.... मैं तो बस इतना चाहता हूं कि जनता के नुमाईदे अपने व्यवहार और गरिमा को नई ऊंचाई देने का प्रयास करें.... बदलाव रातों-रात नहीं होते, परन्तु सुधारों की तरफ कदम तो बढ़ाए जा ही सकते हैं.... मगर, राजनीति का जो चरित्र बनता जा रहा है, उसमें इसकी संभावना तलाशना आकाश से कुसुम तोड़ने जैसा ही हो गया है।




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