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Sunday, 5 July 2015

बिहार की बिसात

बिहार में एक बार फिर से राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है। राजनीति के माहिर खिलाड़ी राजनीति के तमाम पैंतरे आजमाने शुरु कर दिए हैं। इस खेल में कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री ये तो फिलहाल रहस्य बना हुआ है, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी की जंग शुरू हो गई है। इस जंग में नरेन्द्र मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा है, तो दूसरी तरफ लालू यादव और नीतीश कुमार की शक्ति परीक्षा और चुनावी अखाड़े के दो राजनीतिक पहलवान नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार में तरह-तरह के दांव अजमाए जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं बिहार में राजनीति के धुरंधर तरह तरह के पत्ते फेंक रहे हैं। इसी जंग के तहत बिहार की राजनीति में हाल के समय तक धुर विरोधी रहे और एक-दूसरे को अक्सर तक कोसने वाले दो दुष्मन अब दोस्त बन गए हैं। जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बना लिया है। उधर, बीजेपी ने भी सबसे पहले जीतनराम मांझी को अपने पाले में किया, जबकि रामविलास पासवान उनके साथ पहले से ही हैं। इस तरह से बीजेपी ने पूरे दलित वोट को अपने कब्जे में करने की कोशिश की है। दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी के भविष्य से जुड़ा है। नवंबर 2013 से लगातार चुनावी जीत की लहर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी साल दिल्ली विधानसभा में अरविंद केजरीवाल ने करारा झटका दिया था। अब बिहार भी बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती बन गया है। लंबी जद्दोजहद के बाद आखिर लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मंजूर कर लिया। इसके साथ ही बरसों से बिखरे जनता परिवार को एकजुट करने की कवायद सिरे चढ़ गई। बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू और आरजेडी की साझी ताकत का सामना करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा। कई दशकों से जनता दल परिवार बिखरा पड़ा था। समाजवादी आंदोलन की कोख से जनमी इन पार्टियों की खासियत यह है कि जब-जब उनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराते हैं वे एकजुट हो जाती हैं और सत्ता मिलने के बाद अपने नेताओं के अहंकार के चलते बिखर जाती हैं। 1979 में जनता पार्टी के टूटने और 1990 में जनता दल तार-तार हो जाने का कारण कोई बड़ा सैद्धांतिक मतभेद नहीं था, दोनों बार कुछ नेताओं के सत्ता-मोह और अहंकार के कारण पार्टी टूटी थी। हांलाकि इस बार एक बात अलग है। इससे पहले हमेशा कांग्रेस के विरोध में ये दल और नेता एकजुट होते थे और उन्हें बीजेपी का साथ मिलता था। लेकिन समय बदलने के साथ इनकी मुखालफत अब बीजेपी के साथ हो गई है, जिसमें कड़वे घूंट तक पिए जाने की बातें की जा रही हैं। बहरहाल, मिलना और मिलकर बिछड़ना, यही भारतीय राजनीति में समाजवादी कुनबे का इतिहास रहा है और यही इनकी पहचान भी। आज लोहियावादी मुलायम सिंह यादव इनके सारथी बने हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें इन दलों से लगाव है, बल्कि उन्हें भी अपनी पार्टी को लेकर एक डर सताने लगा है। वो चाहते है कि जनता परिवार का एक प्रयोग बिहार चुनाव से शुरु हो और अगर ये सफल होता है, तो 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव में भी आजमाया जाएगा। यानी एक बात तो साफ हो जाती है कि राजनीतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य यही है कि उन्हें किसी भी तरह सत्ता की मलाई खाने को मिले।
लालू-नीतीश फैक्टर
छात्र आंदोलन से उभरे इन नेताओं ने बिहार की राजनीति को व्यापक रूप से बदल दिया। जब से लालू और नीतीश बिहार की राजनीति के क्षितिज पर उभरे हैं, तब से सत्ता समीकरण लगातार उनके इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। लालू के परंपरागत मतदाता बिहार के सोलह फीसदी यादव और चौदह फीसद मुसलमान हैं। खराब वक्त में भी राजद को करीब बीस फिसदी मत मिले हैं। इसी प्रकार नीतीश को करीब सोलह फीसद मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है और इसलिए राज्य में पिछले पच्चीस साल में से पंद्रह साल लालू ने, तो दस साल नीतीश ने राज किया है। लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं का सिक्का चला है। साल 1998 के लोकसभा चुनाव में इन दोनों के दलों ने चौवन में से सत्ताईस सीटें जीती थीं, जबकि साल 1999 में पच्चीस। सन 2000 में विभाजन के बाद झारखंड अलग हो गया, लेकिन जेपी आंदोलन की कोख से जन्में लालू और नीतीश का प्रभाव जस का तस बना रहा। 2004 के आम चुनाव में दोनों ने चालीस में से अट्ठाईस और 2009 में चौबीस सीटों पर विजय दर्ज की। 2014 के आम चुनाव में पहली बार दोनों पार्टियों को करारा धक्का लगा। दोनों के कुल छह प्रत्याशी ही जीत पाए। जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया, तब नाराज नीतीश ने बीजेपी के साथ सत्रह बरस से चल रहा गठबंधन तोड़ कर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। जेडीयू को इस निर्णय की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी, लेकिन आम चुनाव में पराजय से नीतीश ही नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रीय दलों ने बड़ा सबक सीखा। उन्हें पता चल गया कि अकेले दम पर बीजेपी को रोकने की ताकत किसी एक पार्टी में नहीं है। भगवा दल के पैरों में बेड़ियां मिल-जुल कर ही डाली जा सकती हैं। परिणामस्वरूप पिछले साल समाजवादी आंदोलन से निकले छह दलों ने विलय की घोषणा की, जिसका फल अब सामने आया है। सांप्रदायिक ताकतों को पराजित करने के लिए लालू और नीतीश ने हाथ मिलाया, यह सत्ता की चाशनी ही है जो दो दोस्तों को दूर करने या फिर पास-पास लाने का माद्दा रखती है। वैसे भी राजनीति में कोई स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होता। भारतीय राजनीति में ऐसी अनेक नजीर हैं और उन्हीं में दो नाम लालू यादव और नीतीश कुमार हैं। दरअसल, कुछ माह पूर्व दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बीजेपी का घमंड चकनाचूर किया था और बिहार उपचुनावों में लालू और नीतीश ने साझा प्रत्याशी खड़े कर बीजेपी को धूल चटाई थी। इन परिणामों से विरोधी दलों को पता चल गया कि मोदी लहर को रोकना कठिन नहीं है। हलांकि तब से अब तक स्थिति में परिर्वत जरूर हुआ है। क्योंकि जेडीयू के नेता और पूर्व मुख्य़मांत्री जीतनराम मांझी पार्टी से बगावत करके अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा का गठन कर लिया हैं और वो बीजेपी के साथ जा मिले हैं। वहीं लालू की पार्टी से राजेश रंजन उर्फ पप्पु यादव ने भी आरजेडी से बगावत करके अपनी अलग पार्टी बना ली है। हलांकि सुपौल सीट पर उनकी पत्नी कांग्रेस से सांसद हैं और ऐसे में रंजीता रंजन के लिए धर्मसंकट वाली स्थिति पैदा हो गई कि वह पति की पार्टी के लिए वोट मांगें या कांग्रेस के लिए। लालू-नीतीश के खेमे की इस बगावत ने शायद बीजेपी की जीत को आसान कर दिया है। वह कहीं से भी लालू-नीतीश और कांग्रेस गठबंधन से उन्नीस नहीं है।
बीजेपी भी है तैयार
लोकसभा चुनाव में बीजेपी-एलजेपी-राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी को 38.8 फीसदी वोट मिले थे, आरजेडी-कांग्रेस-एनसीपी को 29.7 फीसदी वोट जबकि जेडीयू को 15.8 फीसदी वोट मिले थे। नये समीकरण के मुताबिक आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस-एनसीपी के वोट फीसदी को जोड़ दें तो ये आंकड़ा 45.5 फीसदी हो जाता है। यानी एनडीए से ये 6.7 फीसदी ज्यादा था लेकिन जीतन राम मांझी के जेडीयू से छिटकने से जेडीयू का महादलित वोट बैंक तहस-नहस होता दिख रहा है और इसका सीधा फायदा अब बीजेपी होगा। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जहां सबसे ज्यादा नुकसान हुआ और आरजेडी-जेडीयू को जहां सबसे फायदा हुआ वो इलाका नॉर्थ बिहार का सीमांचल इलाका है। यहीं से बीजेपी की विरोधी पार्टियां किशनगंज, अररिया, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया और कटिहार से जीती थी। जहां पर मुस्लिम और यादव वोटरों की अच्छी खासी संख्या हैं। इसी इलाके में पप्पु यादव का बोलबाला है। पप्पु यादव की पकड़ पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा और सुपौल में अच्छी है। पप्पु यादव अब आरजेडी को छोड़कर अपनी पार्टी का गठन कर लिया हैं। ऐसे में पप्पु यादव यादव बीजेपी से हाथ मिलाते हैं या नहीं इसका फायदा वोट जुड़ने या वोट बंटने से बीजेपी को ही होगा। उधर, बीजेपी के पास कुशवाहा भी हैं, जिससे लव-कुश जाति के वोटों में भी सेंध लगेगा। बिहार में कुरमी और कोइरी यानी कुशवाहा जाति को लव-कुश जाति कहा जाता है। इन दोनों जातियों में आपस में शादियां भी होती हैं और राजनीति में दोनों साथ-साथ ही वोट करते रहे हैं। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा ने अलग दल बना कर इन दोनों जातियों के वोटों को अलग कर दिया। यह नीतीश कुमार के लिए चिंता की बात हो सकती है, क्योंकि अभी तक इन दोनों जातियों के 8 फीसदी वोटों पर नीतीश कुमार का एकछत्र राज था। इसके अलावा बीजेपी के परंपरागत वोट अगड़ी जातियां बीजेपी के साथ जा सकती हैं। यही वजह है कि बीजेपी को इस बार के विधानसभा चुनाव में जीत की आस है। लेकिन बीजेपी के पास यहां पर एक कमजोर कड़ी भी दिखती है। वह है बिहार में नीतीश के टक्कर में उनके पास कोई दमदार नेता नहीं है, जो नीतीश का सीधा मुकाबला कर सकता हो। यही वजह है कि बीजेपी किसी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना कर चुनाव नहीं लड़ चाहती है। उधऱ बिहारी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा मुंहफुलाए बैठे हैं। बिहार के बीजेपी नेताओं से उनकी बनती नहीं है। साथ ही उन्हें लगता है कि उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जाना चाहिए था। उन्हें यह भी लगता है कि यदि केवल सांसद बन कर ही रहना है, तो वह आरजेडी या जेडीयू से भी बना जा सकता है। यानी चुनाव निकट आने के साथ-साथ बीजेपी में अंतर्कलह तेज होने के आसार हैं। इसका दुष्प्रभाव बीजेपी के सहयोगी दलों और उनके वोट बैंक पर पड़ना लाजमी है। अब देखना है कि बीजेपी बिहार में चुनाव प्रचार को कैसे संभालती है। मोदी कैबिनेट में बिहार से छह मंत्री हैं और बीजेपी का प्रचार का तरीका बिहार चुनाव को काफी रोचक बनाने वाला है।

बहरहाल, संसदीय लोकतंत्र में हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है, लेकिन बिहार के दोनों गठबंधनों के लिए इस चुनाव के खास मायने हैं। इससे सिर्फ बिहार की भावी सत्ता का स्वरूप ही नहीं तय होगा, इसके नतीजे देश के भावी राजनीतिक समीकरण का चेहरा भी तय करेगा। दरअसल देश की भावी राजनीति के नजरिए से अगले दो साल का समय बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होंगे। लगभग एक तिहाई लोकसभा सीटों पर इन तीन सूबों का अधिकार है। वहां सत्ता पाए बिना बीजेपी का राष्ट्र पर एकछत्र राज करने का सपना साकार नहीं हो सकता। यानी अगर बिहार में जनता परिवार का परीक्षण सफल रहा तब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश और फिर पश्चिम बंगाल की चुनावी जंग और दिलचस्प हो जाएगी।  लेकिन अगर बिहार में बीजेपी की जीत हुई, तो आगे के चुनावों के लिये उसके हौसले बुलंद होंगे। साथ ही राज्यसभा में बहुमत पाने की उसकी कोशिश को और बल मिलेगा और आगे के विधानसभा चुनावों में ज्यादा दमखम के साथ उतरेगी। 




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