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Tuesday, 4 August 2015

राजनीति में संवादहीनता

वक्त बदला, सरकार बदली, विपक्ष बदला, पर नहीं बदला तो संसद का चेहरा.... जी हां... वहीं रोज के हो हल्ले, रोज के हंगामे और संसद की कार्यवाही ठप्प.... फर्क सिर्फ इतना है कि जब यूपीए की सरकार थी तब बीजेपी के सांसद, संसद नहीं चलने देते थे.... अब जब एनडीए की सरकार है तो इस काम का जिम्मा कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने उठा लिया है.... दरअसल पांच साल की सरकार में राजनीति ऐसे ही चला करती है... बीच में कोई पिसता है तो वो है जनता.... पर जनता को किसे फिक्र है इन नेताओं को तो सिर्फ अपनी राजनीति चमकानी है... हंगामे के चलते सदन में कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं हो पा रहा... कुछ जरूरी विधेयकों पर चर्चा लगातार टल रही है.... ऐसे में विपक्ष से सहयोग की अपेक्षा स्वाभाविक है.... आखिर संसद चर्चा का मंच है, सरकार के खिलाफ नारेबाजी का नहीं.... लेकिन इस मामले में सरकार से भी लोकतांत्रिक रवैए की अपेक्षा की जाती है.... आखिर संसद में कामकाज का माहौल बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उसी की है.... जब से मानसून सत्र शुरू हुआ है, विपक्ष सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे की मांग पर अड़ा हुआ है.... कांग्रेस की दलील है कि विपक्ष के रूप में उसने वही स्टैंड अपनाया है जो कभी बीजेपी अपनाया करती थी... उधर विपक्ष के इस रुख से सरकार को रत्ती भर चिंता नहीं.... उसकी कोशिश विपक्ष पर जवाबी हमला बोलने और उसे विकास में बाधक बताने की है... वह शुरू से ही विपक्ष को छकाने की मंशा से रणनीति बनाती रही है.... फिर जहां तक राजनीति का सवाल है, तो उसका तकाजा है कि अड़े रहो.... झुको मत, अगर एक बार झुके तो फिर झुकते रहना होगा और शायद इसलिए सरकार झुकना नहीं चाहती... लेकिन इन सबके बीच उन सावा-सौ करोड़ जनता का क्या.... जो तरह-तरह के मुद्दों पर सरकार से जवाब का इंतज़ार कर रही है... छात्र लाठियां खा रहे हैं... सैनिक अपनी पेंशन का इंतज़ार कर रहे हैं... बाढ़ की समस्या मुह बाए खड़ी है... किसानों के मुआवज़ा मिलने का मुद्दा कहां गया.... वो किसी को पता नहीं.... इससे यही लगता है कि हमारा विपक्ष आलसी हो चला है.... वो नए तथ्यों की तलाश में अपना पसीना नहीं बहाना चाहता.... और सिर्फ विपक्ष होने के नाते अपना विरोध दर्ज कराना चाहती है... साफ है सत्ता और विपक्ष, दोनों अधिक से अधिक आक्रामक दिखना चाहते हैं... कहने को बीजेपी संसद में बहस कराने को उतावली तो दिख रही है, पर बहस के नतीजों को लेकर उसमें घबराहट भी साफ देखी जा सकती है.... बहरहाल भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक संवाद की जमीन पिछले तीन-चार सालों में जितनी कम हुई है, उतनी शायद इमर्जेंसी को छोड़कर पहले कभी नहीं रही.... जब दोनों पक्षों के वोट संवादहीनता से ही निकलते हों तो संसद चले या चले, किसे पड़ी है।