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Tuesday, 8 December 2015

'बंटी दादा' के जज्बे को सलाम.....


कहते है सपने उन्हीं के पूरे होते, जिनके सपनों में जान होती है.....
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसले से उड़ान होती है......

जी हां, ऐसा ही कुछ कर दिखाया हैं जौनपुर उत्तर प्रदेश के अक्षांश गुप्ता, जो शरीर से 95 फीसदी विकलांग होने के बाद भी ना केवल अपने काबलियत के बल पर जेएनयू में दाखिला पाया, बल्कि जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर में अपनी कड़ी मेहनत और लगन से पीएचडी कर दुनिया के सामने कायमाबी की मिसाल पेश की और ये सावित कर दिखाया कि मेहनत, लगन और काबलियत हो तो विकलांगता भी आपकी सफलता में बाधा नहीं बन सकती। 

अक्षांश ने कम्प्यूटर साइंस से बी-टैक और एम-टैक किया पीएचडी का विषय भी कम्प्यूटर से ही जुड़ा पर काफी अनोखा चुना था। हमलोग हमेशा सोचते हैं कि कैसे कम्प्यूटर से हम और अधिक स्मार्ट बने। पर उन्होंने ये सोचा कि किस तरह से कम्प्यूटर को ही और स्मार्ट बनाया जाए। ताकि कम्प्यूटर के दिमाग को इंसानी सोच के साथ और भी बेहतर बनाया जा सके। अक्षांश की उपलब्धि के वजह से ना केवल उनके परिजन, दोस्त बल्कि जेएनयू के वाइस चांसलर भी गौरवान्वित हैं। इसलिए अक्षांश के लिए विशेष तौर पर दिक्षांत समारोह का आयोजन कर उसे डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। जबकी जेएनयू में दिक्षांत समारोह नहीं होता है।
वैसे तो डॉक्टर की डिग्री में उनका नाम अक्षांश गुप्ता लिखा है, लेकिन कैंपस में सब लोग उन्हें 'बंटी दादा' के नाम से जानते हैं। बंटी दादा के शरीर के निचले हिस्से बेकार है, वो ठीक से बोल नहीं पाते हैं। उनकी बोली समझने में भी परेशानी होती है, यहां तक कि हाथ भी सही तरीके से काम नहीं करते हैं। शरीर की लाचारी को मात देने वाले बंटी दादा कहते हैं कि अपने भाई-बहनों को स्कूल जाते देख उनकी भी पढ़ने की इच्छा होती थी, लेकिन शरीरिक विकलांग होने के चलते कोई स्कूल एडमिशन नहीं देता था। हमारे देश में शरीरिक रूप से अक्षम लोगों को कमजोर समझा जाता है। इसके बाद भी उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी की और कामयाबी की मंजिल को छूकर अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' लगवाया और दुनिया के सामने कायमाबी की मिसाल पेश की। 32 साल के बंटी दादा ने जेएनयू के कैंपस में बनी होस्टल में रहकर 5 साल तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने 'ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस' विषय पर थीसिस तैयार की। रिर्चस पूरी करने के लिए वह मलेशिया भी गए। होस्टल के एक छोटे से कमरे में रहते हुए उन्होंने कभी शारीरिक अक्षमता को पढ़ाई में आड़े नहीं आने दिया।
उनके दोस्त बताते हैं कि बंटी दादा का असाधारण दिमाग है। बंटी दादा सिर्फ अपने बारे में ही नहीं सोचते, बल्कि अपने जैसे ही दूसरे छात्रों के बेहतरी के लिए भी सोचते हैं। इसलिए यूजीसी के नेट, जेआरएफ परीक्षा में विकलांग छात्रों के क्वालिफाइंग मार्क्स को SC/ST के बराबर करवाया। जबकि इसके पहले तक वो ज्यादा था। इतना ही नहीं 2012 के स्टूडेंट प्रेसिडेंट के चुनाव में छात्रों का प्रतिनिधि बन उनकी तरह के छात्रों के बेहतरी की तरफ सबका ध्यान खिंचा, तो वहीं दूसरी तरफ 2012 में ही एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस ऑन एजुकेशन में जेएनयू के तरफ से मलेशिया में प्रतिनिधित्व भी किया और कई अवार्ड जीते।

ये सच है कि काबलियत, हूनर खुद ही अपनी सफलता की राह तलाश लेती है और अक्षांश ने भी ऐसा ही किया है। पर सोचने वाली बात है कि क्या अक्षांश जैसे होनहार सभी छात्र इस मुकाम तक पहुंच पाते होंगे? क्या वो अपने सपनों को पुरा कर पाते होंगे? शायद नहीं क्योंकि इनके जैसे छात्र को ये जरूरी नहीं कि हर जगह शिक्षा के अवसर मिल ही जाए। सरकार और समाज ने इनके जैसे छात्रों के लिए कुछ विशेष स्कूल जरूर बनाए हैं। पर जरूरत है इन्हें इस तरह के स्कूल के साथ सामान अवसर भी मिले और शुरूआती शिक्षा के स्तर में भी सुधार हो। खैर बंटी दादा के जज्बे को देख कर ये बात कही-ना-कही सही लगती है खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है...?