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Saturday, 5 March 2016

राजनीति का सबसे बुरा दौर




देश की राजनीति पिछले कुछ सालों से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। इससे पहले शायद ही आपने राजनीति का ऐसा दौर देखा हो। हो सकता है आपने देखें भी हो लेकिन मैंने तो कभी नहीं देखा। हालांकि आप कहेंगे मैंने अभी राजनीति को देखा ही कितना है, लेकिन जितना भी देखा है एक बात तो तय है कि एक राजनेता का बेटा होने के नाते मैंने राजनीति को बचपन से बहुत करीब से देखा, जाना, समझा और परखा भी है।
दरअसल राजनीति में हमेशा से विरोधी को नीचा दिखाने और खुदको उपर दिखाने की परंपरा रही है और उसके बिना राजनीति शायद संभव भी नहीं है। लेकिन हमेशा ये एक दायरा और मर्यादा में होता रहा है। पर पिछले कुछ सालों में जिस तरह से केवल दूसरों को नीचा दिखाने की परंपरा चल पड़ी है उससे आम जन के हितों का मुद्दा तो गायब ही होता जा रहा है। सारी ताकतें सिर्फ इस पर झोक दी जाती है कि कौन देशभक्त है तो कौन देशद्रोही, कौन दलितों, अल्पसंख्यकों का हितैषी है तो कौन दुश्मन.... हर किसी का सिर्फ एक ही मकसद रह गया है किसी तरह से येन केन प्रकारेण सत्ता को हथियाना और अगर सत्ता उसके पास है तो उसे बरकरार रखना।
मैंने देखा है कि आतंकी हमलों के बाद हर मौके पर देश एक जुट होता रहा है,  चाहे दिखावे के लिए ही सही एकजुटता सब तरफ दिखाई देती थी, चाहे वो राजनीतिक दल हो या फिर समाज के विभिन्न अंग। लेकिन आज आतंकियों के सवाल पर देश कुछ इस तरह से बट गया या यूं कहें कि बांट दिया गया, जहां सत्ता राष्ट्रभक्ति का राग अलापते हुए विपक्ष को देशद्रोह कहने से नहीं चूक रही, तो दूसरी ओर विपक्ष सत्ता पर देश भक्ति का खौफ पैदा कर अपनी असफलता छुपाने का आरोप लगा रही है।
इस सबके बीच संसद में या तो चर्चा ही नहीं होती या होती भी है तो सिर्फ इस में समय निकाल दिया जाता है कि रोहित दलित था या नहीं, कन्हैया देशद्रोही है या नहीं, इशरत आतंकी थी या नहीं। क्या इन सब सवालों को सुलझाने के लिए देश की जनता उन्हें वहां तक पहुंचाती है। मैं ये नहीं कहता कि इन मुद्दों पर चर्चा ना हो, इन सभी मुद्दों पर भी चर्चा हो लेकिन सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए ना हो। क्योंकि इन मुद्दों से आम जन का भला होने वाला नहीं हैं। इशरत केस को अगर दबाया गया तो पहले उसकी जांच हो फिर जो सामने निकल कर आए उसपर बहस होनी चाहिए। कन्हैया को जिस तरह से सरकार और विपक्ष ने मिलकर हीरो बना दिया बिना कुछ साबित हुए, क्या वो सही है? क्या अगर वो जांच में देशद्रोही निकला तो विपक्ष देश की जनता से माफी मांगेगी और जनता उसे माफ करेंगी या अगर ये साबित हुआ कि कन्हैया ने देश के विरोध में नारे नहीं लगाए तो क्या सरकार उससे माफी मागेंगी?
याद कीजिए साल 2001, तब भी केंद्र में बीजेपी की ही सरकार थी, और तब गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी थे, आज भी बीजेपी की ही सरकार है, और आज गृह मंत्री राजनाथ सिंह है। तब भी 6 छात्रों पर राजद्रोह के आरोप लगे थे, इस बार करीब 10 छात्र पर देशद्रोह का केस हैं। तब ये छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी के थे, इस बार जेएनयू के हैं। लेकिन उस वक्त और इस वक्त की कहानी अलग है। उस वक्त अफगानिस्तान में अमेरिकी अतिक्रमण से भन्नाए 6 छात्रों पर इस लिए देशद्रोह का आरोप लगाया गया क्योंकि उन्होंने अमेरिका के खिलाफ पर्चें बांटे थे और अमेरिका के साथ देने के लिए भी भारतीय नीति पर सवाल उठाये थे। लेकिन उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी के वीसी तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से मिले और महज 15 मिनट के अंदर आडवाणी ने दिल्ली पुलिस से छात्रों पर से देशद्रोह का आरोप हटाने को कह दिया। लेकिन इस बार ऐसा बवाल खड़ा किया गया कि इससे पूरे विश्व भर में हमारे देश के छवि को नुकसान पहुंचा और देशद्रोह के आरोप झेल रहे कन्हैया को पक्ष और विपक्ष ने मिलकर कृष्ण बना दिया।
दरअसल आज सत्ता की चाह ने इन राजनेताओं को इस कदर अंधा बना दिया है कि वो इसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। मेरे पापा हमेशा कहा करते थे कि जब आदमी को किसी चीज की बहुत ज्यादा चाह होती है तो वो बहुत घटिया बन जाता है और वो हर हाल में अपने चाहत को पूरा करना चाहता है, चाहे उसके लिए उसे किसी भी हद तक क्यों ना जाना पड़े। आज ऐसा ही कुछ लग रहा है।   
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