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Monday, 4 June 2018

क्या एक बार फिर करवट बदलने के मूड में हैं नीतीश ?


सियासत में ऊंट कब किस करवट बैठे यह ऊंट हांकने वाले को भी पता नहीं होता. राजनीति में संभावनाओं की हर वक्त जगह होती है. खासकरबिहार की राजनीति बिल्कुल जुदा है. कहते हैं कि राजनीति में कोई किसी का दोस्त नहीं होता और न ही दुश्मन. उलट-फेर और दल-बदल राजनीति का सबसे बड़ा हथियार हैकौन किसके साथ कब हाथ मिला लेये तय नहीं होता. ऐसे कई उदाहरण हाल में बिहार की राजनीति में आपको देखने को मिले होंगे. सियासी हवा का रुख भांप कर कदम बढ़ाने में भले ही रामविलास पासवान को महारथ हासिल होमगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अब राजनीति की दिशा के अनुरूप ही चलने में विश्वास रखते हैं. पिछले काफी समय से उनके राजनीतिक फैसलों से अब यह प्रतीत होने लगा है कि नीतीश कुमार भी मौके पर चौका मारने में माहिर हो गये हैं.
दरअसल कर्नाटक में सरकार का न बनना और हाल के दिनों में उपचुनावों में भारी शिकस्त ने जहां बीजपी को 'परेशानकर रखा हैवहीं इन दो मोर्चे पर हुई विफलताओं ने इसके सियासी दोस्तों को भी सुनहरा मौका दे दिया है और बिना समय गंवाए नीतीश कुमार ने सियासी तालाब में अपना महाजाल फेंक दिया है. बीजेपी को विपक्षी एकजुटता से डराते हुए जेडीयू ने बिहार की लोकसभा की कुल 40 सीटों में से 25 सीटों की मांग की है.   
सही वक्त पर सही हथियार के प्रयोग में माहिर नीतीश कुमार ने मन बना लिया है कि बीजेपी से सीट के सवाल पर अंतिम फैसला कर ही लेना है. ठीक उसी तरह जैसे बिहार में शादी से कई महीने पहले लड़का और लड़की की छेंका (रोका) कर दी जाती है. नीतीश कुमार को कहीं न कहीं लगने लगा है कि बीजपी जान बूझकर सीट बंटवारे का मामला उलझाना चाहती है.
दरअसलबिहार में लोकसभा की 40 सीटों में से बीजेपी और उसके पुराने गठबंधन (बीजेपी+एलजेपी+आरएलएसपी) 31 सीटों पर काबिज है. जेडीयू के पास महज़ दो सांसद हैं. बीजेपी के पास अकेले लोकसभा की 22 सीटें हैं. रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के पास 6 और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (आरएलएसपी) के पास 3 सीटें हैं. अब जेडीयू से गठबंधन की हालत में बीजेपी के पास देने के लिए महज़ 9 सीटें हैं. 2014 का गठबंधन जारी हैइसलिए बीजेपी के पास नीतीश की पार्टी को सीटें देने के लिए विकल्प बहुत ही सीमित हैं. मौजूदा स्थिति में नीतीश को 25 सीटें मिलना नामुमकिन है.
2009 से पहले बिहार में जेडीयू बड़े भाई की भूमिका में होती थी. तब जेडीयू 25 और बीजेपी 15 सीटों पर चुनाव लड़ती थीलेकिन 2013 में बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन टूटा और 2014 के चुनाव में तस्वीर बदल गई. कभी 15 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी 22 सांसदों की पार्टी बन गई और बड़ा भाई जेडीयू दहाई का आंकड़ा भी नहीं पार कर सकी. अब इस बदले सियासी तस्वीर में जेडीयू की खुमारी उतर नहीं रही है. उसे लगता है कि विपक्षी एकजुटता को दिखकर बीजेपी से ज्यादा सीटें हड़प ली जाए.


नीतीश कुमार का अचानक एक बार फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की कवायद तेज करना भी यूं ही नहीं है. राजद से नाता तोड़ने के बाद काफी समय तक नीतीश कुमार ने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया था, मगर कर्नाटक चुनाव में बीजेपी की हार और विपक्षी एकजुटता की झलक देखते हुए उन्होंने अपना सबसे पुराना सियासी दांव चल दिया हैं. नीतीश को यू-टर्न की सियासत का उस्ताद माना जाता है. लालू यादव का साथ छोड़ समता पार्टी के गठन से लेकर अब तक उनकी अंतरआत्मा कई बार जाग चुकी है. क्या पता वे इस बार भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हों? पहले भी अपने सियासी फैसलों से सबको हतप्रभ करने वाले सुशासन बाबू इस बार भी चकित करने वाला कोई फैसला लेंगे या कयासों के बाज़ार को यूं ही गर्म रखेंगे, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा.